श्री मनकामेश्वर मंदिर में राम जी की लीलाओं का मंचन

Reporter : Mukul Sharma

आज की लीला में बाली वध, हनुमानजी का लंका गमन व जलाना ,विभीषण शरणागति, रामेश्वर पूजन, रावण की सभा में अंगद द्वारा पैर जमाना का मंचन किया गया।

प्रभु श्रीराम सुग्रीव से कहते हैं कि तुम बाली को युद्ध के लिये ललकारो और निर्भय हो कर युद्ध करो। राम के वचनों से उत्साहित हो कर सुग्रीव ने बाली को युद्ध करने के लिये ललकारा। सुग्रीव के इस सिंहनाद को सुन कर बाली को अत्यन्त क्रोध आया। क्रोधित बाली आँधी के वेग से बाहर आया और सुग्रीव पर टूट पड़ा। बाली और सुग्रीव में भयंकर युद्ध छिड़ गया। उन्मत्त हुये दोनों भाई एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। श्री रामचन्द्र जी ने बाली को मारने के लिये अपना धनुष सँभाला परन्तु दोनों का आकार एवं आकृति एक समान होने के कारण वे सुग्रीव और बाली में भेद न कर सके। इसलिये उन्होंने बाण छोड़ना स्थगित कर दिया। राम , लक्ष्मण अन्य वानरों के साथ सुग्रीव के पास पहुँचे। राम को सम्मुख पा कर उसने उलाहना देते हुये कहा, मुझे युद्ध के लिये भेज कर आप पिटने का तमाशा देखते रहे। बताइये आपने ऐसा क्यों किया? यदि आपको मेरी सहायता नहीं करनी थी तो मुझसे पहले ही स्पष्ट कह देना चाहिये था कि मैं बाली को नहीं मारूँगा, मैं उसके पास जाता ही नहीं।

सुग्रीव के क्रुद्ध शब्द सुन कर रामचन्द्र बड़ी नम्रता से कहा, सुग्रीव! क्रोध त्यागो और मेरी बात सुनो। तुम दोनों भाई रंग-रूप, आकार, गति और आकृतियों में एक समान हो अतः मैं तुम दोनों में अन्तर नहीं कर सका और मैंने बाण नहीं छोड़ा। वानरेश्वर! अपनी पहचान के लिये तुम कोई चिह्न धारण कर लो जिससे मैं तुम्हें पहचान लूँ और फिर से युद्ध के लिये जाओ।

सुग्रीव पुनः युद्ध के लिए बाली को ललकारते है। दोनों एक दूसरे पर घूंसों और लातों से प्रहार करने लगे। जब राम ने देखा कि सुग्रीव की शक्ति क्षीण होते जा रही है तो उन्होंने एक विषधर सर्प की भाँति बाण को धनुष पर चढ़ा कर बाली को लक्ष्य करके छोड़ दिया।

बाली के मरणासन्न होते ही प्रभु श्रीराम इसके सम्मुख आकर कहते है कि तुमने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी रुमा का हरण किया जो धर्मानुसार तुम्हारी पुत्रवधू हुई। उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय और राजा का प्रतिनिधि होने के कारण तुम्हारे इस महापाप का दण्ड देना मेरा कर्तव्य था। जो पुरुष अपनी कन्या, बहन अथवा अनुजवधू के पास कामबुद्धि से जाता है, उसका वध करना ही उसके लिये उपयुक्त दण्ड माना गया है। इसीलिये मैंने तुम्हारा वध किया। अब तुम निष्पाप हो कर स्वर्ग जाओगे।

उधर माँ सीता की खोज प्रारंभ हो जाती है ।हनुमान जी समुद्र पार कर अशोक वाटिका में मां सीता को भगवान श्रीराम द्वारा दी गई अंगूठी देते है। जिसको देखकर मां सीता की आंखे भर आती है। इस दौरान हनुमान ने अशोक वाटिका में पेड़ उखाड़कर फेंक दिए। हनुमान द्वारा वाटिका उजाड़ने की सूचना मिलते ही अक्षय कुमार वाटिका पहुंचे। जहां हनुमान और अक्षय कुमार के बीच युद्ध हुआ व अक्षय कुमार मारा जाता है। इसके बाद मेघनाद युद्ध करने पहुंचा। मेघनाद ने हनुमान जी को बांधकर रावण के दरबार में लाया।रावण की आज्ञा से हनुमान की पूंछ में आग लगाई।

हनुमान जी की पूंछ में रावण ने जब आग लगवा दी, तो उसके बाद हनुमान ने उसी पूंछ से रावण की लंका में आग लगा दी। हनुमान जी रावण की सोने की लंका को जलाकर उसका अंहकार तोड़ देते है।

अगली लीला के दृश्य में भक्त विभीषण को रावण द्वारा त्याग देने पर भगवान राम की शरण में आना। भक्त विभीषण का पीछा करते हुए लंका से रावण के गुप्तचर सुख एवं सारण रामा दल में पहुंचते हैं। यहां उनको पहचान लिया जाता है रामा दल की सेना सुख और सारण को सजा देने लगती है तब उन्होंने भगवान राम की शपथ देखकर अपने आप को बचाया। इस बार लक्ष्मण जी द्वारा सुख और सारण को एक पत्र के माध्यम से रावण को संदेश देते हैं वह संदेश ले जाकर रावण को सुनाया जाता है संदेश सोने के उपरांत सुख सारण रामा दल का बखान करते हैं जिस पर रावण नाराज होकर दोनों को लंका से भगा देता है ।भगवान राम द्वारा समुद्र देव को मनाया जाता है। भगवान राम नाराज होकर ब्रह्मास्त्र का आव्हान करते हैं तत्काल घबराए हुए समुद्र देव प्रकट होकर भगवान से क्षमा मांगते हैं और भगवान राम को कहते हैं कि आपकी सेना में नल और नील दो ऐसे वानर है जिनको ऋषि.मुनियों द्वारा श्राप दिया गया था कि वह है जल में
कुछ भी फेंके वह नहीं डूबेगा । आप इस समुद्र पर नल नील के हाथों से पत्थर डलवा कर पुल का निर्माण करें जिससे आप की सेना लंका जा सके ।

पुल निर्माण के पूर्व भगवान राम द्वारा भगवान शिव की स्थापना समुद्र किनारे की जाती है जो कि भारत का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है।

पुल निर्माण पूर्ण होने पर भगवान राम की वानर सेना लंका पहुंचती है। लंका पहुंचकर भगवान राम द्वारा अंगद को अपना दूत बनाकर रावण के दरबार में भेजते हैं यहां अंगद जी रावण को समझाते हैं। नहीं मानने पर वह रावण की सभा में अपना पैर जमा देते हैं और कहते हैं कि इस दरबार में बैठे लोग अगर मेरा पैर उठा देंगे तो मैं अभी हार मानते हुए वापस चला जाऊंगा।

जिस पर रावण के दरबार में बैठे बड़े से बड़े योद्धा यहाँ तक की पुत्र इंद्रजीत तक अंगद का पैर नहीं उठा पाता।

तब रावण स्वयं आकर अंगद के पैरों की ओर झुकता है ।तत्काल अंगद अपना पैर हटा लेते हैं और कहते हैं कि हे रावण आपका स्थान मेरे पैरों में नहीं राम के चरणों में होना चाहिए तब तुम्हारा उद्धार हो जाएगा वह तुम्हें माफ कर देंगे ।यहाँ आज की लीला विराम लेती है।

कल की लीला में रावण कुंभकर्ण को जगाएगा और तत्पश्चात् कुम्भकर्ण वध, लक्ष्मण शक्ति, हनुमान जी का संजीवनी बूटी लाना, मेघनाद वध व रावण वध के बाद बाबा मन: कामेश्वर नाथ जी के दरबार के मुख्य द्वार पर पुतला दहन होगा।
आज आरती के समय महंत निर्मल गिरी महंत कैलाश मंदिर,डॉ रजनीश त्यागी,सुभाष ढ़ल,किशोर कुमार शर्मा क्रिकेट कोच,मुनेन्द्र जादौन,आर पी सक्सेना,नितिन जौहरीं,हर्षिका सिंह,यतिन खन्ना आदि उपस्थित रहे।
व्यवस्था दीप्ति गर्ग, पूजा बंसल, भावना अग्रवाल, बबीता अग्रवाल, कविता, रतिका, सपना सिंह, वर्षा आदि ने सँभाली ।

अतिथियों का स्वागत हरिहर पुरी, बंटी ग्रोवर, थानेश्वर तिवारी, निशांत, भोला, अमर गुप्ता ने किया व शुभाशीर्वाद महंतश्री योगेश पुरी जी ने ।

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